इत्तफाक की बात है जो न चाहा कभी
पर जिंदगी अड़ी थी पहचान बेचता रहा
सपने सजाये थे जमीँ से आसमा तलक
गर्दिश ए दौर में अरमान बेचता रहा
इतनी सफर कटी क्या कुछ मिला किसे
अब तक तो इंसान को इंसान बेचता रहा
फाकाकसी मतलब कब समझेंगे हुक्मरान
भूख माँगती थी रोटी सामान बेचता रहा
मिट्टी लहू है किसान की छीन ले गया
यूँ खाली करके बस्तियाँ वो श्मशान बेचता रहा
हमने वफा की उनसे खुदा बना दिया
छलता रहा वो जालिम ईमान बेचता रहा
उम्मीदों का खंडहर भी गिरा गए हैं सब
वफा नाम है खुदा का ‘विजय’ पैगाम बेचता रहा

-विजय सिंह
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